रुतबा मौत का

देखकर  मुर्दो  को  अक्सर  मैं  मुस्कुरा  देता  हूँ

कुछ   पल  के   लिए  गम  सारे  भुला  देता   हूँ

मिलेगी शौहरत ऐसी ही एेसे सपने सजा लेता हूँ

कुछ फूल उन राहो पर अक्सर मैं बिखरा देता हूँ

चार कंधो पर होगी सवारी मेरी

बादशाहो सा रुतबा होगा मेरा

भले कल भूल जाए जमाना हमें

पर जमाने में  नाम  होगा  मेरा

नर्म फूलो का बिस्तर होगा मेरा

खुश्बुओ से फिजाएँ महक जाएँगी

हर शख्स की जुबां पर नाम होगा मेरा

ये कहानी मेरी याद रह जाएगी

ना चलूँगा पैरो से फिर उस दिन

लोग खुद ही उठाकर के ले जाएँगे

होगा मुस्कुराता ही चेहरा मेरा 

विरोधी भी आखिर में पछताएँगे

कहूँगा ना कुछ सुनूँगा ना कुछ भी

सेज में अपनी वक्त बिताऊँगा 

जला देंगे लोग जिस्म को मेरे

बनके खुश्बू फिजां में महक जाउँगा

लोग डरते हैं क्यूँ यहाँ मौत से

ये तो शुरुआत है एक नए दौर की

ये तो अंत नही है जिंदगी का

ये तो शुरुआत है एक और की





                       मैं अपने वर्डप्रेस के सभी साथी लेखको से क्षमा चाहता हूँ कि मैं व्यस्तता या कहें ‘पेट की रोटी’ का जुगाङ करने में लगा रहता हूँ इसलिए आप लोगो की रचनाएँ कम पढ़ पाता हूँ और जब समय मिलता है तो मैं अपनी तुच्छ रचना प्रदर्शित कर देता हूँ जिसे आपलोग भरपूर प्यार देते हैं जिसके लिए मैं आप लोगो का बहुत आभारी हूँ 


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तेरी याद 

कल तू साथ नही होगा मेरे 

मुझे अकेले ही रहना होगा

तू  क्यूँ  आदत मे  है   मेरे

कल वक्त को बदलना होगा
होंगी हमेशा तेरी यादें दिल में 

पर जुबां से  कुछ  ना  बोलेंगे

तेरी   बाँते  याद  कर कर के

मन  ही  मन  में    रो    लेंगे 
वो आँखो का मिलाना तुमसे

वो सर को अपने झुका लेना

वो मिल के बिछड़ना कई बार

और  रोकर  गले  लगा  लेना 
तू होगी तब भी  ऐसी  ही

पर अन्तर इतना आएगा

तू इज्जत होगी अपनो की

ये पागल याद ना आएगा 
तुमको रुलाता हूँ बहुत 

पर मुझको भी कल रोना है

तेरे प्यार की कीमत अदा करूँ

ये कभी ना मुझसे होना है
कोई पूछेगा जब तुमको तो

मैं कभी ना कुछ बतलाऊँगा

तू रहे हमेशा हरदम खुश

हर दुआ में मैं ये मनाऊंगा
वक्त हमेशा चलता रहता

कल भूल तुम तो जाओगे

पर याद आएगी जब मेरी

नम आँखो से मुस्कुराओगी
मैं एक मुसाफिर दुनिया का

जो प्यार अमर कर जाउँगा

तेरी हर एक एक याद को 

अपने गीतो में दोहराउँगा 

अंतिम सफर

चिलचिलाती धूप में प्यासे उङते पक्षियो ‘ आसमान की तरफ देखती प्यासी धरती ‘ तपिश बढ़ाता सूरज रेगिस्तानी गाँव की गलियो में उठते धूल के गुबार सबके दिलो में खौफ पैदा कर रहे हैं ।

पर इससे ज्यादा तपिश प्यास और उजङापन तो राजू के मन मे था जो एक टूटी चारपाई अपने एक कच्चे छोटे से घर में लेटा था बचपन में ही पिता के गुजर जाने के बाद माँ सदमे मे कुछ बोलना  ही बन्द कर दिया फिर जब बोलना चाहा भी तो

नही बोल सकी छोटी सी उम्र और खुद का और माँ का बोझ पर पेट की भूख और माँ के प्यार ने काम करना सीख ही लिया ।

राजू लेटा हुआ अपनी गृहस्थी को देख रहा था एक घङा कुछ बर्तन एक चूल्हा एक टूटी चारपाई बस यही तो है उसके पास और परिवार में एक गूँगी माँ सब ठीक ही तो था रोज कमाना रोज खाना ” ।। पहले ऐसे ही कभी कभी खाँसी आया करती थी वो टाल जाता था क्योंकि वो गरीब है आज के समाज मे अमीरो की छींक पर जहाँ डाक्टरो की फौज आ जाती है वही एक गरीब की लाश भी कूङे में डाल दी जाती है ।

 जख्म गहरे नासूर बन जाते हैं जिसे वो मामूली खाँसी समझ के टाल रहा था असल मे वो कैंसर था बीमारी बढ़ती गई पर राजू ने ये बात किसी से नहीं बताई बीमारी धीरे धीरे उसके सारे शरीर को खाए जा रही थी ना बता  सकता था और बताए भी तो किसे? 

और पेट के लिए मेहनत वो बराबर किए जा रहा था सबसे मिलता हँसता पर अपना दर्द किसी से ना बता सकता शायद हम उसकी नादानी कहें या कमजोरी ।

आज २ दिन हो गए राजू काम पर नही जा सका खाली बर्तन जैसे चीख चीख के कह रहे हों कि अब अपने लिए न सही पर माँ के लिए कल से काम करना ही पड़ेगा 

” माँ मैं कल शहर जाउँगा बहुत दिन हो गए कही गया नही वहाँ अपने दूर के रिश्तेदार हैं न बड़े भले आदमी हैं जब गाँव आए थे ना तो कह रहे थे राजू आना कल चला जाता हूँ” 

माँ उसकी बाँतो को नही समझ सकी बस सर को हिला दिया ” और कुछ पैसे कल दूँगा तुम्हे कोई परेशानी नही होगी”

जाने की तैयारी हो गई राजू ने माँ की आँखो में देखा एक सवाल था उनकी आँखो में कि गाँव से कई कोस पर सङक है इतनी दूर पैदल कैसे चलेगा ?? राजू ने एक बार अपने घर को देखा वही टूटी चारपाई खाली बर्तन और एक घङा सभी मानो उसे विदाई दे रहे थे एक बार अपनी रोती माँ के पैर छूकर और दिल पर पत्थर रखकर राजू आगे बढ़ गया ।

जब मंजिलें नहीं मिलनी होती तो रास्ते अक्सर दूर हो जाया करते हैं राजू के लिए भी सड़क बहुत दूर हो गई उसके कदम उसका साथ नहीं दे रहे थे ‘ साँसे तेज चलने लगीं आँखो के आगे अंधेरा छाने लगा और उसके लड़खड़ाते कदमो ने आगे बढ़ने से मना कर दिया और उसके शरीर का बोझ गर्म रेत पर धम्म से गिर गया ।।

   अब उसे ना उठने की जल्दी थी ना ही कहीं पहुँचने की उसकी आँखो के सामने माँ का चेहरा वही खाली बर्तन टूटी चारपाई का दृश्य घूम रहा था और सारे दृश्य धूमिल होते जा रहे थे धीरे – धीरे ………………। 

मेरा नजरिया

आजकल देख रहा हूँ
बहुत पास से जिंदगियाँ
समझ रहा हूँ जरा
जिंदगी की बारीकियाँ

बिक रहा सामान सब
आज इस जहान् में
हर चीज की है कीमत
मेरे हिन्दुस्तान में

कहीं सारे शौकीनो
अमीरो का बोलबाला
कहीं कूड़े में ढूढ़ता
कोई पेट का निवाला

सिमटी है दुनिया अब
अब हर इंसान की
दो पैर वालो की दुनिया

न पशु बदजुबान की
कई देश हैं यहाँ

           इस देश के अन्दर

कई वेश हैं यहाँ

            हर इंसान के अन्दर

है नजरिया ही ऐसा

           या सच दुनिया है ऐसी

पता नही मैं क्या कहूँ

           जो जैसा ये वैसी

नाजुक रिश्ते

बङे नाजुक हैं रिश्ते आज के

हमेशा टूटने का डर रहता है

बङे नाजुक हैं धागे प्यार के

हमेशा टूटने का डर रहता है

समझ नही आता कब क्यूँ

कोई अपना रूठ जाता है

साथ  जो था  हाथ अपने

जाने  कहाँ  छूट  जाता है 
बात कौन सी चुभ जाए 

किसी को कोई ना जाने

सोच समझ के ही बोलो

कि  कोई  बुरा  ना  माने
मिले बुलन्दी चाहे जितनी

पर साथ जब अपने न हों

पैसा वो किस काम का 

जब रिश्ते ही साथ न हों
मालिक इतना रहम करना

कि धागे  प्यार के  टूटे ना

रहे वक्त  कैसा  भी  मेरा

साथ अपनो  का छूटे ना
                                                कृष्णा ‘अज्ञानी’

है नारी तू

तुम हो क्या अब दुनिया को दिखला दो

अपनी शक्ति की अब  पहचान करा दो

बंधन डर कायरता छोड़ कर अब तुम

अपनी शक्ति का तुम परचम लहरा दो

अबलापन का अब चोला नहीं

हे नारी! वीर बनना ही होगा

अब हर राक्षस मनचले को

अब तुम्हे कुचलना ही होगा

सदियो से सहा अब बहुत हुआ

सहो  ना  अब अत्याचारो  को

दिखा   दे   तू  शक्ति  अपनी

इन   जाहिल   मक्कारों   को

जब घूरे कोई तो नजर मिला

हर बंधन  को तू  आग लगा

सदियो से अत्याचार हुआ

सह ना अब तू शक्ति जगा

है कमजोर नही ये जान ले तू

है बलवानो  से बलवान है तू

है  पूजन  की अधिकारी  तू

है  जग महान  ‘ है नारी तू’!

एक मसीहा आएगा

              गरीबी और ये पापी पेट इंसान 

से क्या नहीं कराते? छोटू अभी मुश्किल से ६ साल का हुआ था; पर गरीबो की उम्र नहीं मायने रखती ‘ अमीरो के महल से निकले कचरे में वो अपनी रोजी रोटी तलाश करता था । उसके बाल मन में बस एक ही बात थी ” काम करने से ही खाना मिलता है उसके लिए स्कूल शिक्षा सब सपना था ।

        

तम्हे पता है माँ कहती है ” एक दिन आएगा जब हमें कोई काम नही करना पड़ेगा वो माँ बोलती है कोई ‘मसीहा’ आएगा  ।।  तब हम तुम यहाँ नहीं आएँगे और सारा दिन कंचे खेलेंगे ‘  उसके दोस्त ने बिना समझे ही सिर हिला दिया ।

             

         

माँ’ माँ मसीहा कब आएगा रोज की तरह छोटू ने अपनी माँ से वही सवाल दुहरा दिया ।” आएगा जरूर अाएगा उस दिन अच्छा खाना खेलना और बस आराम कोई काम नहीं ‘ उसकी माँ ने वही पुश्तैनी कहानी जो कभी अपनी माँ से सुनी थी अपने बेटे को भी सुना दी । वो भी बचपन से सुनती थी मसीहा तो कभी नही आया कहने वाली माँ भी चल बसी ।

              

सर्दियों के दिन आ गए पर मसीहे के इन्तजार में छोटू की आँखे मसीहा के इन्तजार में लगी रहीं ।।  सर्दियाँ गरीबी और अमीरी नहीं देखती और अपने आगोश में उसे ले लिया कई दिनो से अच्छा नहीं महसूस कर रहा था ‘ फिर भी उसे इन्तजार था मसीहे का  ।।

              

   सर्दियों की काली रात में अमीरो के घरो से बेदखल हुई सर्दी गरीबो की साँसे रोक रही थी वहीं चुपके से उनके घरो से निकला उजाला उनके फुटपाथ के आशियाने को रोशन कर रहा था ‘ पतली सी चादर में जब सहना मुश्किल हो गया तो छोटू की आँखे छलक पड़ी  माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया ।

” माँ मसीहे वाली कहानी सुनाओ वो कब आएगा? ” माँ आँखे भककर कहानी सुनाने लगी और मौत के मसीहा के साथ छोटू कब चला गया वो जान ही नही पायी   ंंंंं

  देखो देश मेरा ‘ मंगल’ पे जा रहा है ।  अमीरो के ठहाको से फिजा गूंज रही है  और वहीं एक माँ अपने बेटे की लाश को सीने से लगाए कह रही है     

         एक मसीहा आएगा  —————-